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प्रतिफल

Posted On: 18 Sep, 2011 Others,लोकल टिकेट में

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आपने बच्चों को रॉकेट चलाते देखा है ?
वह तेज गति से असमान की ओर जाता है -
और खो जाता है, फिर नष्ट हो जाता है ;
विलीन हो जाता है, असमान की ऊँचाईओं में
और, नष्ट कर लेता है – अपने अस्तित्व को |
परन्तु एक वृक्ष है,
जो पहले नीचे की यात्रा करता है,
गहराई तक अपनी जड़ें जमाता है
और फिर, बन कर खड़ा हो जाता है -
एक विशाल वृक्ष,
आसमान को छूता हुआ
अडिग,निडर,स्थापित !
खड़ा रहता है सैकड़ों वर्षों तक -
लोगों को अपनी छाँव देता,
विश्राम देता, फल देता एवं
प्राणवायु देता |
क्योंकि
उसने पहले नीचे की यात्रा की है,
अपने को मजबूत किया है -
जड़ों के सहारे से |
उसकी जड़ें दिखती नहीं, पर -
वे ही आधार हैं, उसके विकास की,
उसकी विशालता की,
उसकी परोपकारिता की -
ठीक नींव के पत्थर की तरह |
आपने ताज देखा है?
यदि हाँ! तो,
उसके संगमरमरी बदन को भी देखा होगा
फिर
उसके कंगूरे व् गुम्बद को भी देखा होगा
और, अनायास ही मुंह से निकला होगा-
- वाह, ताज..!
परन्तु
क्या कभी सोंचा है,उस ईंट के विषय में -
जो मिट्टी के अन्दर दबी है,
और
जिस पर टिकी है -
यह संगमरमरी इमारत,
यह प्रेम की इबारत,
यह कंगूरे,और यह गुम्बद |
उस ईंट में प्रदर्शन की भावना नही
उसे सुन्दरता की अपेक्षा नहीं
उसे लोगों की वाह !, की
आवश्यकता नहीं-
क्योंकि
वह नींव की ईंट है,
जिस पर टिका है उसकी
तपस्या का-
विकास रूपी प्रतिफल ||
— आप कभी वृक्ष के विकास को,
उसके तने से नहीं,बल्कि जड़ों से आंकना ;
– आप कभी ‘ ताज ‘ की सुन्दरता को,
उस दबी हुयी ईंट से देखना ;
– आप कभी अपनी सफलता को,
माता-पिता और गुरु के-
त्याग,परिश्रम और आशीर्वाद से जोड़ना :
तब………
समझ आयेगी -
उन जड़ों की विराटता,
उस ईंट की सार्थकता,
और
माता-पिता,गुरु की भावना,
और समझ आयेगा कि-
इस विराटता,
इस सुन्दरता,
इस विकास के लिए,
मिलने वाली ‘ वाह ! ‘ का
असली हक़दार कौन है ??????

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