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तस्वीर

Posted On: 20 Sep, 2011 Others,लोकल टिकेट में

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बारिश थमने का नाम नहीं ले रही थी , सुखराम अपने घर की पिघलती कच्ची दीवारों को देख रहा था | वैसे घर के नाम पर कच्ची दीवारों से घिरा हुआ जमीन का एक टुकड़ा मात्र था उसके पास |पीछे की दीवार पर एक फूस का छप्पर था जो साइड की दोनों दीवालों के सहारे टिका हुआ था | सामने की दीवार पूरी तरह से खुली हुयी थी | सुखराम छप्पर के नीचे बैठा सामने की दीवार को एकटक देख रहा था जो की जलती मोमबत्ती की तरह वर्षा की मार से उपर धीरे-धीरे पिघल रही थी | वह इश्वर से मन ही मन यही प्रार्थना कर रहा था कि बारिश रुक जाये परन्तु इन्द्र देव का कोप तो मानो उसी पर पड़ रहा था |वह समझ नही पा रहा था की क्या करे , अचानक उसके मष्तिष्क में विचार आया कि क्यों न कुछ पुआल दीवार पर ‘छानी’ के रूप में रख दे जिससे कम-से-कम वर्षा जल कि सीधी मार से तो दीवार बच ही जाएगी |
……….सुखराम ने पुआल के गट्ठर को छप्पर के नीचे से उठाया और सीढ़ी लगाकर दीवार पर बिछाने लगा | वह दीवार पर चढ़ गया | दीवार की चौडाई दो फिट से कम नही थी परन्तु थी तो वह मिटटी की ही | जल के प्रवाह एवं प्रहार से पत्थर भी रेत कण में परिणित हो जाता है तो फिर मिटटी की उस दीवार की भला क्या विसात थी की पानी की मार को रोक सकती | सुखराम चटाई की तरह पुआल को दीवार पर बिछा रहा था , इस प्रक्रिया में वह कई बार फिसलकर गिरते-गिरते बचा , परन्तु मेहनत से बनाये गये आशियाने को इस कदर ढहते कैसे देख सकता था वह , अतः हिम्मत के साथ पैर के पंजों को गड़ा-गड़ा कर दीवार को ढकने की कोशिश कर रहा था |
अचानक तेज की बिजली कड़की और इसी के साथ दीवार भरभरा कर पलट गयी |सुखराम जो कुछ क्षण पहले दीवार के उपर था खड़ा था ,उसे यह अंदाजा नही था कि यह इतनी जल्दी गिर जाएगी परन्तु बारिश से नमी अन्दर तक पहुँच चुकी थी | क्षण मात्र में ही परिद्रश्य उल्टा हो गया | अब सुखराम दीवार पर नही बल्कि दीवार कि मिटटी सुखराम के उपर थी | जैसे-तैसे वह मिटटी के लोंदे हटाकर बाहर निकला, शुक्र था कि दीवार कि मिटटी उसके पैरों तक ही पहुंची थी इस से सुखराम की जान तो बच गयी परन्तु इस हादसे में उसने अपना एक पैर गँवा दिया |
…………..बारिश थम चुकी थी, स्थानीय थाने की पुलिस समेत गाँव के लेखपाल और परगना अधिकारी भी सुखराम के घर के समीप इकठ्ठा थे | कुछ देर बाद एक बैलगाड़ी वहाँ आकर रुकी | गाँव के कुछ सुधी जनों के साथ सुखराम अस्पताल से वापस आ गया था अब उसके शरीर का संतुलन बनाने के लिए उसके पास दूसरा पैर नही बल्कि एक बैसाखी थी |
अधिकारियों ने मौका-मुआयना किया और आपदा राहत कोष से शीघ्र ही मुआवजा दिलाने का आश्वासन देकर चले गए | सुखराम के पास खेती-बाड़ी तो थी नहीं, मजदूरी करके वह इतना कमा लेता था कि अपना व् दस वर्षीय बेटे राघव का पेट भर सके | पत्नी पांच वर्ष पहले ही गुजर चुकी थी | सुखराम राघव के विषय में सोच रहा था | उसे खाट पर पड़े पंद्रह दिन हो चुके थे इन दिनों राघव भी स्कूल नहीं जा सका था, तीमारदार के रूप में एक मात्र राघव ही तो था |
……………आज एक माह बाद उसने खाट छोड़ी, इस बीच गाँव वालों ने आपसी प्रेम-सौहार्द का परिचय देते हुए उसके व् राघव के राशन-पानी का इंतजाम कर दिया था | सुखराम को अब कोई काम भी नहीं मिलेगा एक लंगड़ा भला कर भी क्या सकता था , उसने गाँव में किसी से यह सोचकर कुछ पैसा भी उधार ले लिया कि मुआवजे कि रकम मिलते ही अदा कर देगा, परन्तु राघव का स्कूल जाना बंद नही किया | परन्तु नियति को कुछ और ही मंजूर था , चार माह बीत गए लेकिन उसे आर्थिक सहायता नहीं मिल पायी, थक-हार कर राघव को अपनी पढ़ाई छोड़ मजदूरी करनी पड़ी | यह एक बिडम्बना ही थी कि बालश्रम रोकने के बड़े-बड़े दावे करने वाली सरकार की कार्यप्रणाली के चलते एक बालक को मजदूरी करने के लिए विवश होना पड़ा | सुखराम ने दफ्तरों के खूब चक्कर काट लिए परन्तु नतीजा भ्रष्टाचारियों के बीच फंसकर, ‘ ढाक के तीन पात ‘ होकर रह गया |
………..गाँव में मंत्री जी आ रहे हैं, यह समाचार सुन सुखराम को आशा की एक किरण दिखाई पड़ी | सोंचा की वह मंत्री जी के समक्ष समस्या रखेगा तो वे तुरंत इसका निदान करवा देंगे फिर राघव को मजदूरी नही करनी पड़ेगी, आर्थिक सहायता से वह एक दुकान खोल लेगा और बैठे-बैठे कमाएगा …………| सुखराम इन्ही ख्यालों में खोया हुआ था, दूसरी तरफ गाँव में मंत्री जी के स्वागत की जोर-शोर से तैयारियां चल रही थीं | मंच तैयार हो रहा था, ग्राम प्रधान ने माली को अग्रिम दे दिया था कि नियत समय पर फूल -मालाओं की कमी न रहने पाए | पंडाल के अन्दर विभिन्न पदाधिकारियों के चाटुकारिता युक्त भाषा में पदनाम लिखे बैनर उसकी शोभा बढ़ा रहे थे , जैसे मंत्री जी इन्ही सब को पढ़ने यहाँ आ रहे हों | लाउडस्पीकर की व्यवस्था अलग से की गयी थी | कैमरामैन भी तैयार था |
गाँव के एक छुटभैये नेता ने सुखराम को यह सलाह दी कि वह अपना चिकित्सा प्रमाण-पत्र बनवा ले और गिरे हुए मकान व् अपनी फोटो जो पैर की अपंगता दर्शाती हो खिंचवा ले ताकि मंत्री जी को वह दिखा सके | सुखराम ने कुछ और कर्ज लेकर जैसे-तैसे यह सब किया |
************** पंडाल में सबसे आगे की पंक्ति में सुखराम बैठा था | मंत्री जी नियत समय से दो घंटा विलम्ब से पधारे | उनका गाडी से उतरकर मंच पर आना था कि लोगों में मंत्री जी को माला पहनाते समय अपनी फोटो खिंचाने की होड़ लग गयी | हजारों रुपयों की मालाएं मंत्री जी को पहना दी गयी – कवि माखन लाल चतुर्वेदी जी के पुष्प की अभिलाषा मात्र अभिलाषा बन कर रह गयी | मंत्री जी ने विजयी मुद्रा में मालाओं को गले से उतार एक कोने में पटक दिया |….अनेक लोग मंत्री जी के चरणों में झुक कर प्रणाम कर रहे थे, जैसे कह रहे हों — ‘ त्वमेव माता च पिता …………………..त्वमेव सर्वं मम देव देव |’ मंत्री जी का सीना गर्व से फूला जा रहा था | ऐसे में निरीह, निराश्रित, अपंग सुखराम अपनी बारी की बाट जोह रहा था |
************** भीड़ कुछ कम हुयी तो वह बैसाखी के सहारे मंच के समीप पहुंचा | मंत्री जी को वह कागज-पत्तर थमा नीचे जमीन पर बैठ अपनी आपबीती बताने लगा | मंत्री जी ने अफ़सोस व्यक्त किया और शीघ्र उसकी अर्जी आपदा राहत कोष में पहुँचवाकर उसे मुआवजा दिलाने का वायदा भी किया | सुखराम के चेहरे पर संतोष के भाव थे, जैसे उसकी मेहनत सफल हो गयी हो |
************* मंत्री जी अपनी ही तान में रटा-रटाया भाषण दिए जा रहे थे | सुखराम के प्रार्थना-पत्र के साथ ही कुछ अन्य लोगों ने भी अपनी-अपनी समस्याएं लिखित रूप में दी थीं जिन्हें मंत्री जी ने अपने पी.ए. को सौंप दी थीं | भाषण धारा प्रवाह चल रहा था इस बीच पी.ए. ने उक्त प्रार्थना-पत्र एक गनर [ अंग रक्षक ] को सौंप दिए, उसने कागजों को उल्टा-पुल्टा और रोल बन चुकी सुखराम की फोटो को सीधा किया एवं कुछ देर तक उसे देखता रहा |
************* मंत्री जी को तम्बाखू की लत बचपन से ही थी , पढ़ाई में कुछ खास दिलचस्पी नही थी , दिन भर मटरगस्ती करना,मारपीट करना उनका शगल बन गया था | इन्ही कारणों के चलते वे प्राइमरी के बाद आगे नही पढ़ सके थे, वही आज मंत्री के पद पर पहुंच गए | एक अन्य नेता का वक्तव्य याद आ गया कि -” ज्यादा पढो तो डॉक्टर इंजीनियर बन जाओ ,उससे कम पढो तो वकील बन जाओ ,उससे भी कम पढो तो लेखक / पत्रकार बन जाओ , और बिलकुल न पढ़ो तो शिक्षा मंत्री बन जाओ |” [ पाठक गण क्षमा करें, परन्तु उपर्युक्त वक्तव्य वास्तव में एक नेता द्वारा ही कहा गया है ] वास्तव में हमारे देश की यह भी एक विडम्वना है कि देश चलाने वालों में से अधिकांश को यह पता नही रहता कि वे जो बोल रहे हैं उसका अर्थ क्या है ………|
*************** अचानक मंत्री जी ने वक्तव्य के बीच में ही बेचैनी वश खोजी नजरें इधर-उधर घुमाई | उनके संतरी ने उनकी बेचैनी को भांपा और डिबिया से तम्बाखू निकाल कर मलने लगा | तम्बाखू मलने के बाद मंत्री जी तक पहुँचाने कि जुगत में माध्यम के रूप में उसे सुखराम कि फोटो ही उपयुक्त लगी | उसने फोटो को मोड़ कर उसमें तम्बाखू को रख पुडिया जैसी बना दी जो कि मातहतों के बीच एक-दुसरे के हाथ से गुजरती हुयी मंत्री जी तक पहुँच गयी | मंत्री जी ने एक छोटा सा ब्रेक लिया , फोटो को नाली जैसा बनाकर तम्बाखू को मुंह में डाला, फोटो पर भी सरसरी नजर डालकर अजीब सा मुंह बनाया | तम्बाखू को होठों के बीच दबाकर फोटो को एक कोने में फेंक दिया और पुनः भाषण प्रारंभ कर दिया |
************** सुखराम जो अपनी फोटो कि दुर्गति देख रहा था , उसमें इतना साहस नहीं रहा कि उस फोटो को उठाकर पुनः मंत्री जी को सौंप सके | अपने विश्वास पर कुठाराघात से वह इतना आहत हो गया जितना कि शायद वह अपनी व् मकान कि दुर्गति पर भी नही हुआ था | उसका विश्वास चिंदी-चिंदी होकर बिखर गया भावावेश में वह अर्धमूर्छित सा हो गया | परन्तु अर्ध चेतना में वह कभी मंत्री तो कभी फोटो को देख रहा था …..|
************* मंत्री जी इधर – उधर निहार रहे थे , लगता था जैसे वह कोई उपयुक्त चीज तलाश रहे हों , सुखराम को लगा कि शायद उन्हें मेरी फोटो याद आ गयी हो | कुछ देर बाद उन्होंने मौका देख मुंह में भरी पीक की पिचकारी थूकी जो कि उस तस्वीर को सराबोर करती हुयी आगे निकल गयी | सुखराम कि अर्ध बेहोशी एक कदम और आगे बढ़ गयी, उसकी आँखें पथरा गयी | जो हुआ शायद उसने उसकी कल्पना भी नही की होगी | कुछ क्षण बाद उसके प्राण पखेरू उड़ गये और वह वहीं लुढ़क गया |
********** भाषण बंद हो गया, सुखराम के आस-पास सभी लोग एकत्र हो गये , मंत्री जी भी मंच से नीचे उतर आये | राघव ने पुकारा – बापू…! बापू….! , परन्तु उसका बापू अब लम्बी यात्रा पर जा चूका था जहाँ उसके स्थूल शरीर की अपंगता बाधक नहीं थी | वातावरण में एक अजीब नीरसता घुल गयी, लोग स्तब्ध कि अचानक यह सब कैसे हो गया …|
******* मंत्री जी पुनः मंच पर आ गये, मरने वाले के प्रति शोक-संवेदना व्यक्त की | सभा विसर्जित हो गयी | काफिला जा चूका था , सुखराम की तस्वीर पर इतने पैर, चप्पलें, जूते गुजर गये कि तस्वीर चिंदी-चिंदी हो गयी — जिसे पहचानना भी मुश्किल हो गया |
******** समाप्त *********

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360 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

abodhbaalak के द्वारा
September 23, 2011

कैलाश जी लग रहा है की मैंने इस रचना को पहले भी कहीं पढ़ा है, इसी मंच पर, पर याद नहीं आ रहा है? क्योंकि आपने केवल ४ पोस्ट ही की है तो ….. खैर, अत्यंत मर्म्स्पर्शीय रचना है, दिल को छू लेने वाली …. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    Dr.KAILASH DWIVEDI के द्वारा
    September 23, 2011

    आदरणीय भाई साहब सादर प्रणाम ! आपने सदैव मेरा उत्साह वर्धन किया है | बहुत-बहुत धन्यवाद | आपकी याददास्त की दाद देनी पड़ेगी | यह सही है की पहले मैंने इस रचना को ” naturecure ” ब्लॉग में प्रकाशित किया था | अब मैंने साहित्यिक रचनाओं के लिए ” abhyudaya ” ब्लॉग बना दिया है | अब ” naturecure ” में स्वास्थ्य सम्बन्धी लेख और ” abhyudaya ” में कहानी / कवितायेँ आदि लिखेंगे |

    Jaelyn के द्वारा
    July 12, 2016

    Your answer was just what I neddee. It’s made my day!

Vinita Shukla के द्वारा
September 21, 2011

लचर व्यवस्था की बदहाली को रेखांकित करती हुई मार्मिक रचना. सार्थक पोस्ट पर बधाई.

    Dr.KAILASH DWIVEDI के द्वारा
    September 21, 2011

    आदरणीय विनीता जी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद |

    Steffi के द्वारा
    July 12, 2016

    hacker / broz when i use generate key then i get 1 msg idm has been register with fake serial no or the serial no has been blocked ࢶ≾………so plzz broz tell me what can i do

संदीप कौशिक के द्वारा
September 21, 2011

आदरणीय कैलाश जी, सादर प्रणाम ! भाषा-शैली अत्यंत सुंदर एवं प्रभावशाली लेकिन रचना उतनी ही दिल के पार से होकर जाने वाली । बहू बहुत आभार आपका !!

    Dr.KAILASH DWIVEDI के द्वारा
    September 21, 2011

    आदरणीय कौशिक जी, सादर प्रणाम ! प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद |

    Frenchie के द्वारा
    July 12, 2016
UMASHANKAR RAHI के द्वारा
September 20, 2011

आदरणीय डॉ, साहब अत्यंत मार्मिक रचना ………. बधाई |

    Dr.KAILASH DWIVEDI के द्वारा
    September 21, 2011

    आदरणीय भाई साहब , सादर प्रणाम ! प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद |

    Nettie के द्वारा
    July 12, 2016

    Un mod inenresatt de a face o petitie online clever ! Eu propun o infiintare ad-hoc al unui tribunal chinezesc untr-un restaurant cu specific, aici in tara, pentru evitarea logisticii necesare. Daca e gasit vinovat, il si mancam

Rajkamal Sharma के द्वारा
September 20, 2011

आप की इस करुण कथा से एक सच्ची घटना याद आ गई …… पंजाब के मुख्यमंत्री बादल की सभा में एक विकलांग दम्पति ने घुसने की कोशिश की तो किसी ने भी उनको अंदर नहीं जाने दिया …… दो चार दिनों बाद वोह बेचारे किसी दूसरे शहर में हुई जनसभा में मुख्यमंत्री तक पहुँच ही गए ….. लेकिन बेशर्मी की हद देखिये की उन्होंने कहा की मैं इस मामले में कुछ नहीं कर सकता ! लानत है ऐसे नेताओं पर ….. :) :( ;) :o 8-) :| http://rajkamal.jagranjunction.com/2011/09/18/“जब-जागरण-गांव-की-सभी-शादी/

    Dr.KAILASH DWIVEDI के द्वारा
    September 21, 2011

    आदरणीय शर्मा जी , सादर प्रणाम ! प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद |

Santosh Kumar के द्वारा
September 20, 2011

आदरणीय कैलाश जी ,..बहुत मार्मिक कहानी ,..पता नहीं कितने सुखराम हैं हमारे देश में ,…हार्दिक साधुवाद

    Dr.KAILASH DWIVEDI के द्वारा
    September 21, 2011

    आदरणीय संतोष जी , सादर प्रणाम ! प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद |

    Caiya के द्वारा
    July 12, 2016

    I should have made it clear that the magazine ਠP28” was the official journal of the Abbey Nullius, (i.e., an abbey that is beyond the jurisdiction of the local bishop) of New Norcia. Bindoon was situated in the Abbey territory and the Abbot of New Norcia was, in effect, the local bishop, having jurisdiction over the teaching of Christian Doctrine at Bindoon (and nothing else!).

akraktale के द्वारा
September 20, 2011

डाक्टर साहब सादर प्रणाम. बहुत ही विचलित कर देने वाली मार्मिक रचना. पढते पढते रचना के सारे दृश्य चलचित्र की भाँति आँखो  के सामने गुजरने लगे. मँत्रीजी के पीछे गई भीड में राघव का उसके बापू की लाश को उठाकर ले  जाने के लिये किसी के आने की आस का दृश्य रुला रहा है. यही यथार्थ है. बधाई.

    Dr.KAILASH DWIVEDI के द्वारा
    September 21, 2011

    आदरणीय भाई साहब , सादर प्रणाम ! प्रतिक्रिया के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद |

    Kaylee के द्वारा
    July 12, 2016

    These buttons rock. I&7#;182ve got mine up, but my link to your page is not working, so I’ll have to work on it. When I put it in the sidebar, nothing else on the page shows up. Hmmmph. I’m gonna work on it! This Nablo WriMo will be great!

Amita Srivastava के द्वारा
September 20, 2011

कैलाश जी , दिल को झकझोर देने वाली मार्मिक प्रस्तुति |

    Dr.KAILASH DWIVEDI के द्वारा
    September 21, 2011

    आदर्य अमिता जी , नमस्कार ! प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद |

    Bubba के द्वारा
    July 12, 2016

    Minden elismerésem, Max, én ilyenkor az 1. kör után feladom.Ja, és többnyire a felejtÅ‘be teszem a sikertelen recit. Kitartó vagy!!Az meg hogy kerek, v. szögletes, totál mi.oigyn…Beztds fincsi lett, és nem is olyan ronda :) Lilian

suman dubey के द्वारा
September 20, 2011

कैलाश जी नमस्कार । बहुत सुन्दर आलेख । मंत्री जी पुनः मंच पर आ गये, मरने वाले के प्रति शोक-संवेदना व्यक्त की | सभा विसर्जित हो गयी | ——————————-सत्य दर्शाता है।

    Dr.KAILASH DWIVEDI के द्वारा
    September 21, 2011

    आदर्य सुमन जी , नमस्कार ! प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद |

chandrajeet के द्वारा
September 20, 2011

कैलाश जी आप का लेख दिल को छू गया हकीकत यही है बहुत अच्छा .. पढ़ें ….. रामचरितमानस में “मंगल” का अदभुत रहस्य ( एक प्रयास )

    Dr.KAILASH DWIVEDI के द्वारा
    September 21, 2011

    आदरणीय चंद्रजीत जी , नमस्कार ! प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद |

    Keyla के द्वारा
    July 12, 2016

    BS low – raatnotliiy high! Really good answer!

nishamittal के द्वारा
September 20, 2011

दुखद किन्तु कतु सत्य निर्धन के दिन नहीं बहुरते हाँ उसका अस्तित्व इस आशा में मिट जाता है.राजनीतिज्ञ उनमें संवेदनाएं होती नहीं.वो स्वयम को ईश्वर समझते हैं.बहुत अच्छे ढंग से प्रस्तुत मार्मिक कथा कैलाश जी.

    Dr.KAILASH DWIVEDI के द्वारा
    September 21, 2011

    आदरणीय दीदी सादर प्रणाम ! प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद |

    Trudy के द्वारा
    July 12, 2016

    Am si eu o inr,bearetca ma bate la cap unu si ma intreaba care e mai bun dintre urmatorii antivirusi : G Data sau Avira premium seurity suite 10 ?Astept parerea ta! Multumesc anticipat!


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