अभ्युदय

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अभ्युदय;दलित उत्थान की एक कहानी

Posted On: 24 Sep, 2011 Others,लोकल टिकेट में

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वह उसे चुपचाप कनखियों से देख रहा था, एक नजर उसे देखता तो दुसरे पल नजर हटाकर अपने आस-पास देख लेता की कहीं कोई देख तो नही रहा है |
” धर्मा कहाँ गया है भागवान ! पंडित रमाशंकर का स्वर गूंजा |
धर्मा की तन्द्रा भंग हुयी, उसने माता-पिता के वार्तालाप को सुन लिया था, वह चुपचाप छत पर से निचे आ गया |
” क्यों साहबजादे ! आज कल कहाँ खोये रहते हो ?” पिता ने पूंछा तो वह सर झुकाए खड़ा रहा, फिर अपने कमरे में चला गया |
************* पंडित रमाशंकर की उम्र यही कोई ४० वर्ष रही होगी, धर्मा उनका इकलौता बेटा था | पंडित जी की गाँव में बहुत इज्जत थी, आस-पास के कई गाँवों में उनकी यजमानी थी | परिवार में पंडिताई पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही थी | सुबह से ही पंडित जी के घर के बाहर लोगों की भीड़ एकत्र होनी प्रारंभ हो जाती | किसी को बेटा हुआ है – उसका मुहूर्त देखना है , किसी को कोई वस्तु खरीदनी है – उसका मुहूर्त तो किसी को एकादशी कब है, अमावस्या कब है – यह जानने की आकांक्षा | पंडित जी बाहर आते और लोगों की समस्या का निराकरण करते, एवज में दक्षिणा लेकर आस-पास के गाँवों में निकल जाते | दो-चार घरों में ” सत्यनारायण व्रत कथा ” कहकर दक्षिणा में धन,आंटा,दाल,चावल इत्यादि बैलगाड़ी में रख कर घर की ओर प्रस्थान कर जाते |
वैसे तो पंडित जी के पास कुछ खास जमीन नहीं थी परन्तु फिर भी उनके अन्न के भंडार भरे रहते | यजमानी के अतिरिक्त नयी फसल पर गाँव वाले आकर अपनी अन्न राशी का कुछ हिस्सा पंडित जी को दान स्वरुप दे जाते थे |
पं. रमाशंकर की भविष्य की योजना थी कि वे एक भव्य मंदिर का निर्माण करेंगे और बुढ़ापे में उसी में पूजा-पाठ करेंगे तथा लोगों की समस्याओं का निराकरण भी करेंगे |
**************** ‘ काशीपुर ‘ गाँव शहर से दूर, विकास से वंचित हरिजन बहुल गाँव था | लगभग पांच हजार की आबादी वाले इस गाँव में ब्राह्मणों के गिने-चुने घर थे | उसी में एक घर पं. रमाशंकर जी का था | वे अपने सोलह वर्षीय पुत्र धर्मा को भी पांडित्य परिपाटी में ढालना चाहते थे, परन्तु धर्मा को इसमें रूचि नहीं थी, हालाँकि वह नास्तिक नहीं था परन्तु वह इसे कैरियर के रूप में नहीं अपनाना चाहता था | गाँव से लगभग सात-आठ किमी. दूर स्थित कस्बे के कालेज में दसवीं कक्षा का छात्र था वह |
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काशीपुर के एक संपन्न किसान थे सुखराम, उन्होंने अपने परिश्रम से अपनी आर्थिक स्थिति काफी सुद्रढ बना ली थी | जमीन भी उनके पास पर्याप्त थी | अपनी हरिजन बिरादरी में वे सबसे संपन्न व्यक्ति थे | चूँकि कालेज गाँव से दूर था और गाँव में शिक्षा के प्रति इतनी जागरूकता भी नहीं थी, इसीलिए गाँव की अधिकांश लड़कियां प्राईमरी स्तर तक ही शिक्षित हो पायीं थीं | आगे की पढाई के लिए उनके अविभावकों ने कालेज भेजना उचित नहीं समझा | परन्तु सुखराम ने अपनी बेटी नंदिनी की पढाई बंद नहीं करायी | नंदिनी थी भी मेधावी | धर्मा और नंदिनी एक ही कक्षा में थे | वे दोनों एक साथ स्कूल आते, स्कूल में भी अधिकांश समय एक साथ बीतता — इस सब के चलते, जैसे स्वाभाविक रूप से होता है – कब उनके किशोर मन में प्रेम का बीज प्रस्फुटित हो गया, उन्हें पता ही नहीं चला | जैसे-जैसे समय बीतता गया, वैसे ही प्रेम प्रस्फुटन – अंकुर बनकर विकसित फिर पुष्पित पल्लवित होने लगा |
………..फिर जैसा की कहा जाता है कि इशक छुपाये नहीं छुपता , वाही हुआ | गाँव में चर्चा होने लगी , दबी जुबान लोगों ने कानाफूसी शुरू कर दी , परन्तु खुलकर बात करने का सहस किसी में भी न था | बात पं. रमाशंकर व् सुखराम के कानों में भी पहुँच गयी | पं. जी सन्न रह गए और सुखराम भयभीत ; एक असुरक्षा कि भावना उसके अन्दर प्रवेश कर गयी | दोनों जातियों में विरोध के स्वर फूट पड़े | एक तरफ पूरा हरिजन समाज और दूसरी तरफ सवर्ण बिरादरी | पं.जी की बिरादरी ने उन्हें जाति से बेदखल कर देने की धमकी भी दे डाली | पं. रमाशंकर जी परेशान ……….. इस नालायक ने तो कहीं का नहीं छोड़ा |
********* धर्मा को उसकी माँ ने समझाया , जाति-धर्म का वास्ता दिया | पिता की डाट-मार भी उसने खायी | इतना हंगामा होने पर भी धर्मा ने ऊपर मन से नंदिनी से रिश्ता तोड़ लेने एवं उसे कभी न मिलने की हामी जरुर भर ली | परन्तु उसके ह्रदय में प्रेमांकुर गहरी जड़ें जमा चुका था , जिसे उखाड़ना कठिन था | वैसे भी किशोर मन पर एक बार जो भाव अंकित हो जाएँ उनको मिटाना असंभव है | जीवन पर्यंत उसकी छाप स्मृति-पटल पर अंकित रहती है , भले ही समय या परिस्थितियों की धुल उसे धूमिल कर दें परन्तु वर्षों बाद भी अनुकूल परिस्थितियों में वे उभर कर सामने आ ही जाती हैं |
*********** धर्मा स्कूल के लिए बाहर निकल ही रहा था की पं. जी ने धीरे से उसे बुलाया और पुनः नंदिनी से न मिलने की हिदायत देने लगे | धर्मा के न चाहते हुए भी पता नहीं क्यों मुंह से निकल गया – ‘ पिता जी , हम दोनों एक दुसरे को प्रेम करते हैं |’
पंडित जी बुद्धिमान थे , थोड़े नर्म होकर बोले – ‘बेटा! प्रेम की परिणिति तुम समझते हो ? इस भौतिक जगत में प्रेम की परिणिति विवाह पर जाकर समाप्त होती है , और तुम तो जानते हो की नंदिनी हमारी जाति की नहीं फिर उसके साथ तुम्हारा विवाह कैसे हो sakta है |’
धर्मा- ‘ पिताजी जाती-धर्म के बंधन समय और परिस्थितियों के अनुसार बने होंगे , पर अब समय बदल चुका है ……..|’ धर्मा अपनी बात पूरी भी नही कर पाया था की पंडित जी को क्रोध आ गया और एक जोरदार तमाचा उसके गाल पर जड़ दिया, कड़कदार आवाज में बोले-’कान खोलकर सुन लो – दलितों के साथ ‘रोटी’ और ‘बेटी’ का सम्बन्ध न तो हमारे खंडन में कभी हुआ है और न ही भविष्य में होगा |
धर्मा सहमा हुआ अपने गाल को सहलाता हुआ बाहर निकल गया | वह साईकल पकडे पैदल ही चला जा रहा था , मन में आक्रोश था परन्तु बगावत की हिम्मत नही थी |’रोटी’ और ‘बेटी’ का वाकया उसके मन में उथल-पुथल मच्ये हुए था | विचारधारा chal रही थी | उसे याद आया, उसकी भैंस ने जब दूध देना बंद कर दिया था तब पिताजी ने उसे पड़ोस के दलित रामदीन को यह कहकर दे दिया था की- दोबारा दूध देने तक वह इसे पाले , व्याने पर वह वापस ले लेंगे , इसके एवज में उसे उसके परिश्रम का पैसा दे दिया जायेगा | इस बीच घर में दूध की कमी हुयी तो रामदीन के घर से ही दूध आता रहा |
धर्मा सोंच रहा था कि क्या ढोंग है ,- वह जानवर रामदीन के घर की जूठन खाती है , और रामदीन के हाथ जो यदि सवर्ण की रोटी को छू भर दें तो रोटी अपवित्र मन ली जाती है | उन्ही हाथों से दूध निकला जाता है, फिर भी वह दूध पवित्र है | दूध के सम्बन्ध में कोई जातिवाद नहीं ….. तो फिर खून के सम्बन्ध में जातिवाद क्यों ? क्या यह स्वार्थपरता नहीं | क्या यह ढोंग नहीं कि- दलित कि जूठी रोटी खाकर दिया गया दूध पवित्र परन्तु पवित्रता के साथ दलित की रसोई में बनी रोटी अपवित्र ……| दलित के हाथ से दुहा गया दूध पवित्र — और वही हाथ जीवन भर के लिए पकड़ना पाप क्यों ?
रोटी और बेटी के मकडजाल में धर्मा उलझता चला गया ………..|बंदिशों ने उनका सरेआम मिलना तो बंद करा दिया परन्तु वे दोनों चोरी छिपे मिलते ,प्रेमालाप करते …… समय बीतता चला गया और इसी बीच प्रेम की रपटीली डगर पर दोनों के पांव फिसल गये |
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सुखराम को पता चल गया था कि नंदिनी पेट से है , परन्तु वह कुछ भी बताने को तैयार न थी | उस दिन सुखराम ने नंदिनी कि जमकर पिटाई की थी , वह चुपचाप मर खाती रही परन्तु धर्मा का नाम जुबान पर न ला सकी |
मौका पाकर नंदिनी घर से निकल पड़ी , निश्चित स्थान पर – जहाँ पर धर्मा उसका इंतजार कर रहा था | पास पहुंचकर नंदिनी ने धर्मा के समक्ष प्रस्ताव रखा-’ धर्मा ! अब तो तुम्ही मेरे सब कुछ हो , मैं तुम्हे अपना तन,मन सब सौंप चुकी हूँ | अब लोकलाज से बचने का एक ही उपाय है ,-” हम विवाह के बंधन में बांध जाएँ |”
धर्मा पशोपेश में पड़ गया — ‘ लेकिन घर वाले इस विवाह को स्वीकार नहीं करेंगे नंदिनी |’
नंदिनी – ‘ तो फिर हम दोनों कहीं बाहर निकल चलते हैं | हम दोनों मिलकर अपनी अलग दुनिया बसायेंगे |’

” मैं इसे जन्म दूंगी और इसे इस लायक ब्नायुंगी कि जातिवाद और छुआछुत के नाम पर दलितों का शोषण करने वाले वर्ग विशेष को करारा जबाब दे सके | मैं इसके सहारे अपने अभ्युदय के साथ-साथ पुरे दलित शोषित समाज को स्वयं अपना अभ्युदय करने का सन्देश दूंगी, मैं स्वयं अपने उत्थान की मिसाल बनुगी |”
नंदिनी जानती थी कि घर वाले उसका साथ नहीं देंगे | अतः दृढ निश्चय एवं आत्मविश्वास से लबरेज नंदिनी ने कदम वापस मोड़ दिए | अब वह घर की तरफ नहीं जा रही थी , उसके कदम स्वचालित रूप से अनजानी मंजिल की तरफ बढ़ रहे थे |

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पं. रमाशंकर भव्य मंदिर के नक़्शे का अवलोकन कर रहे थे | कल मंदिर का शिलान्यास होना था , इसको लेकर वे बहुत उत्साहित थे | राजमिस्त्री , शिल्पकार , मजदूरों आदि ने मंदिर परिसर में अपना डेरा जमाया हुआ था | सुवः होते ही पं. रमाशंकर वहाँ पहुंच गये | निर्माण कार्य हेतु नीव की खुदाई प्रारंभ हो गयी | परन्तु यह क्या ? पंडित जी ने देखा तहसीलदार मय कानूनगो, लेखपाल और फ़ोर्स समेत वहां पर आ धमके |
तहसीलदार ने कडक आवाज में पूंछा -’क्या हो रहा है यहाँ पर ?’
पं. रमाशंकर सहमे से आगे बढ़कर आये बोले – ‘साहब मंदिर निर्माण का कार्य चल रहा है |’
तहसीलदार – जमीन किसकी है ?
पं.रमाशंकर – साहब गाँव वालों ने दान में दी है |
तहसीलदार ने लेखपाल को इशारा किया, उसने रिकार्ड देखकर बताया कि-यह तो गरीब दलितों की जमीन है |
पंडित जी – ‘ परन्तु सभी ने अपनी सहमति से थोड़ी-थोड़ी जमीन दान में दी है, यह रहे सहमति पत्र |’ पं. रमाशंकर ने कुछ शपथ पत्र तहसीलदार के समक्ष प्रस्तुत कर दिए |
कुछ देर में जिन दलितों ने जमीन दी थी वे बुला लिए गये | उन्होंने भी एक स्वर में बताया कि सभी ने स्वेक्षा से जमीन दान की है| परन्तु तहसीलदार साहब नही माने बोले – ‘ आप लोग यह जमीन किसी सवर्ण को नही दे सकते |’
पंडित जी हैरान-परेशान से दिख रहे थे कि लेखपाल ने आकर पंडित जी कान में धीरे से कुछ कहा | पंडित जी समझ गये , उन्होंने सौ-सौ के नोटों की एक गड्डी धीरे से तहसीलदार की जेब में सरका दी | सारे कानून गड्डी के नीचे दब गये | तहसीलदार वापस जाने को जैसे ही गाड़ी में बैठे कि सामने जिलाधिकारी की गाड़ी आकर रुकी | पं. रमाशंकर ने गाड़ी की नेम प्लेट देखी तो उनकी सांसे ऊपर की ऊपर और नीचे की नीचे अटक गयी , परन्तु अगले ही क्षण उनकी ऑंखें विस्मय से फटी रह गयीं |
नंदिनी जिलाधिकारी की हैसियत से जीप से नीचे उतरी , वास्तुस्थिति की जानकारी के बाद , तहसीलदार की खबर ली , कुछ ही देर में वह नंदिनी के सामने गिडगिडा रहा था | उसने नोटों की गड्डी चुपचाप पंडित जी को वापस दी और धीरे से वहां से खिसक लिया |
चाहें वह पद का रुतवा हो या नंदिनी द्वारा किया गया यह अहसान हो -कुछ भी हो पंडित जी दस साल पहले लिए गये अपने निर्णय पर एकबारगी सोंचने पर विवश हो गये | उन्होंने नंदिनी को कृतज्ञतापूर्वक देखा और वहाँ से चले गये |
नंदिनी ने देखा वहीं कुछ दूरी पर एक युवक अवसाद की सी स्थिति में बैठा शून्य में निहार रहा था | अरे, यह तो धर्मा है, वह ठिठकी परन्तु न जाने क्यों वापस आकर गाड़ी में बैठकर चली गयी |
नंदिनी ने चुपचाप अपनी चाल का पहला पत्ता खोल दिया था |
नंदिनी आज लगभग दस वर्ष बाद गाँव वापस आई थी | सुखराम सहित अन्य सगे सम्बन्धियों ने उसे हांथों हाँथ लिया | नंदिनी ने इन दस वर्षों में एक स्कुल में होस्टल वार्डन की नौकरी करते हुए अपनी पढाई पूरी की और ‘ भारतीय प्रशासनिक सेवा ‘ में सफलता अर्जित कर अपने गृह जनपद में ही जिलाधिकारी के रूप में तैनात हुई | उसकी प्रतिभा एवं संघर्ष को देखकर उसके समाज के लोगों ने उसके द्वरा की गयी भूल को नकार दिया था | अब नंदिनी की अपने समाज में कलंकिनी की नहीं बल्कि एक संघर्षशील नारी की छवि बन गयी थी | नंदिनी ने कुछ भी छुपाया नहीं, उसका अतीत उसके समाज के लिए ही नहीं बल्कि पूरे जनपद और जनपद ही क्यों, जनपद की सीमाओं के पार भी एक खुली किताब बन चूका था | नंदिनी ने अपना अतीत छुपाने की रंचमात्र भी कोशिश नहीं की थी, बल्कि उसका मानना था की दलितों के शोषण में उनकी सहनशीलता, उनकी चुप्पीऔर उनका भय भी सम्मिलित है | उनकी विरोध न करने की प्रवृत्ति ही शोषण को बढ़ावा देती है|
नंदिनी का मानना था कि स्वयं के अभ्युदय के लिए स्वयं को प्रसारित करना आवश्यक है | सूर्य का अभ्युदय भी तभी होता है जब वह पूर्ण रूप से प्रकाशित होकर रात्रि के अँधेरे को ढकता है | अभ्युदय करने के लिए कोई मसीहा नहीं आएगा, इसके लिए कोई कानून सफल नहीं होगा ,तब तक –जब तक दलित/ शोषित वर्ग अपने अभ्युदय के लिए स्वयं प्रयास नहीं करेगा |
लोगों ने पं.रमाशंकर और धर्मा पर क़ानूनी कार्यवाही करने की सलाह भी दी परन्तु नंदिनी ने स्पष्ट रूप से मना कर दिया | उसने कहा कि ‘ सूर्य की रोशनी को बलात किसी डिब्बे में बंद करके अपने घर में रोशनी नहीं की जा सकती | रोशनी को तो आना पड़ेगा , आवश्यकता है तो सिर्फ इस बात की कि अपने घर की खिड़कियाँ और दरवाजे सूर्य की दिशा में हों और पूरी तरह खुली हुयी हों |

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मंदिर निर्माण का पहला दिन तो ऐसे ही बीत गया, अगले दिन पुनः कार्य प्रारंभ होना था |प्रातःकाल पं. रमाशंकर मंदिर स्थल पहुंचे तो देखा कि सभी मजदूर एक स्थान पर एकत्र हैं               औरआपस  मेंकुछ बातें कर रहे हैं | पंडित जी मजदूरों की तरफ बढ़ गये , मजदूरों में से एक व्यक्ति जो कुछ पढ़ा-लिखा लग रहा था , वहअपने साथियों को बता रहा था -’ आप लोगों आपकी मेहनत का पूरा पैसा नही दिया जा रहा है |’ उसने आगे कहा -’ पास के गाँव में सडक बन रही है , और सरकार यहाँ से दोगुनी मजदूरी दे रही है , ऐसे हम यहाँ काम क्यों करें ?’ सारे मजदूर भड़क गये और काम बंद कर दिया | पंडित जी इतनी मजदूरी देने की स्थिति में नही थे अतः मजदूर काम छोडकर चले गये | मंदिर निर्माण का कार्य फिर अधर में लटक गया | बहुत सोंच-विचार के बाद पं. रमाशंकर ने अपने परिवार के कुछ नवयुवकों को मनाया और एक बार पुनः कार्य प्रारंभ हुआ |
आज पंडित जी सोंच रहे थे कि पूर्वजों द्वारा बनाई गयी ” वर्ण व्यवस्था ” किसी वर्ग विशेष पर लागू नही होती बल्कि व्यक्ति विशेष पर लागू होती है | एक व्यक्ति अपने जीवन में वे सभी कार्य करता है , जो चरों वर्णों – [ ब्रह्मण,क्षत्रिय,वैश्य,शुद्र ] के लिए अलग-अलग निर्धारित किये गये हैं | तो फिर जाति को जन्म के साथ जोड़ना क्या न्यायसंगत है ? – पंडित जी के मस्तिष्क में विचार कौंधा, परन्तु उन्होंने इस पर और अधिक चिन्तन न करके सिर झटक दिया |
कुछ समय तक कार्य ठीक चलता रहा , फिर धीरे-धीरे ब्रह्मण युवक एक-एक करके बहाने बनाकर काम पर आना बंद करते गये | पंडित जी ने उनको बहुत समझाया पर वे तैयार नही हुए |
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धर्मा बाग में बैठा हुआ था – नंदिनी की गाड़ी देखकर वह उठ खड़ा हुआ , उसने हाँथ जोड़ दिए -”नमस्कार” ! कलेक्टर साहिबा |” नंदिनी ने आगे बढकर धर्मा के जुड़े हुए दोनों हाँथ पकड़ लिए | धर्मा के अन्दर एक सिहरन सी दौड़ गयी -”यह क्या कर रहे हैं आप,मैं कोई कलेक्टर की हैसियत से आपसे मिलने नही आई | मुंझे आपके विषय में पता चला था कि पिछले दस वर्षों से आप किसी से ज्यादा मिलते-जुलते नही, बात नही करते इसलिए मैं …………..|” वह चुप हो गयी | काफी देर बाद नंदिनी ने चुप्पी तोड़ते हुआ पूंछा -
-”शादी कर ली आपने ?”
धर्मा ने सिर उपर उठाया, नंदिनी की आँखों में देखा फिर बोला -’जो व्यक्ति अपने प्रेम को मंजिल तक न पहुंचा सका हो, वह भला किसी और से शादी करके क्या सिद्ध करना चाहेगा |’ ‘ खैर तुम बताओ -कैसी हो ?, कहाँ रही इतने दिन ;नंदिनी ! मैं सच कहता हूँ कि उस दिन मैंने अपनी बात पूरी नही कर पाई थी कि तुम उठकर चल दी, मैंने सोंचा घर जाओगी, परन्तु …………| मैंने तुम्हे बहुत ढूंढा नंदिनी ,-लेकिन ……….|’ धर्मा की आँखें डबडबा आयीं |
नंदिनी ने अपनी आपबीती उसे बता डाली – कि कैसे उसने होस्टल वार्डन की नौकरी करते हुए IAS किया |
- ‘बच्चे का क्या हुआ ?’- धर्मा स्वर में कंपकंपाहट थी |
- ‘बेटा है, दस वर्ष का हो गया है |’ कंहा है वह ? धर्मा ख़ुशी से उछल पड़ा |
- ‘ समय आने पर सब स्पष्ट कर दूंगी |’
नंदिनी सोंच रही थी कि क्या यह वही धर्मा है, जिसने दस साल पहले गर्भपात कि सलाह दी थी | वह सोंचने लगी कि  | वक्त बहुत बड़ी चीज है , जो बीतने के साथ-साथ व्यक्ति में परिपक्वता ही नही  परिवर्तन भी ला देता है | *
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नंदिनी ने अपनी जाति के सभी व्यक्तियों को एकत्र किया और उनसे मंदिर के कार्य को पूरा करने का अनुरोध किया | नंदिनी की बात भला कौन टालता, अगले दिन सभी पंडित जी के यहाँ एकत्र हो गये | आगे नंदिनी , उसके पीछे पूरा हुजूम | पं. रमाशंकर एकबारगी डर गये, सोंचा कि – शायद नंदिनी आज बदला चुकाने आ गयी | पंडित जी ने संशयपूर्वक परन्तु विनम्र स्वर में आने का कारण पूंछा तो वह बोल पड़ी – ‘ यह सभी लोग आज से मंदिर के निर्माण कार्य में श्रमदान करेंगे |’
पंडित रमाशंकर तो फुले नही समा रहे थे , इतने व्यक्तियों के कार्य करने से तो चंद दिनों में ही कार्य पूर्ण हो जायेगा, वह भी मुफ्त में | परन्तु नंदिनी की यह दरियादिली पंडित जी को कुछ विचलित कर गयी | कुछ ही देर में सभी मंदिर स्थल पर थे | कार्य प्रारंभ हो गया , कुछ ही दिनों में एक भव्य मंदिर तैयार हो गया था |

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आज मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा थी , पूरा गाँव ही नही बल्कि आस-पास के गांवों के लोग भी मंदिर प्रांगण में उपस्थित थे | धर्मा भी पूजा की वेदी पर बैठा था | प्राण प्रतिष्ठा प्रारंभ होने वाली थी कि नंदिनी सामने आ गयी -
‘रुक जाईये पंडित जी !, हालांकि मेरा उद्देश्य पूजा में विघ्न डालना नहीं है , परन्तु आज आप पहले मेरे कुछ प्रश्नों का उत्तर दे दीजिये , फिर प्राण प्रतिष्ठा का कार्य करिये |
पंडित रमाशंकर ने विस्मित होकर नंदिनी की तरफ देखा – बोले ‘ क्या है पूछिये |’
नंदिनी ने कहना प्रारंभ किया -’ पंडित जी ! आप तो पवित्रता के पुजारी हैं , परन्तु यह मंदिर तो अपवित्र है क्योंकि इसको बनाने वाले यह मजदूर दलित हैं , मंदिर की प्रत्येक ईंट में इनका पसीना लगा होगा तो क्या यह मंदिर पवित्र रह पाया ?
- इन लोगों ने मंदिर की मूर्तियों को तराशा है , कभी धोखे से इनके हाँथ पर हथौड़ी लग गयी , फिर खून बहा वह इन मूर्तियों में भी लगा | प्रतिष्ठित होने पर आप इन मूर्तियों का चरणामृत पान करेंगे -तब क्या आप पतित नही हो जायेंगे ?
- इन्ही दलितों ने अपने खेतों से फूल लेकर मालाएं बनाई हैं , भगवान की पोशाकें बनाई हैं | इन्ही को भवन की मूर्तियाँ धारण करेंगी – तब क्या यह मूर्तियाँ पवित्र बनी रहेंगी ?
- आपने प्रसाद के लिए जो पंचामृत बनाया है , उसके लिए दूध दलित बुधिया के घर से आया है | आपने इसमें जो शहद डाला है – वह दलित जग्गू के घर के पेड़ पर लगे मधुमक्खी के छत्ते का है , जिसे जग्गू ने अपने हांथों से अपने ही बर्तन में निकलकर आपको बेंचा है | इस पंचामृत में ठाकुर जी स्नान करेंगे और फिर यही पंचामृत आप लोग प्रसाद के रूप में ग्रहण करेंगे — तो क्या आप लोग अपवित्र नही हो जायेंगे ?
- और तो और आप जो जनेऊ पहने हैं उसका सूत रमई जुलाहे ने काता है और उस सूत को गुरुकुल में पढने वाले मेरे बेटे सिद्धार्थ, जो कि पूजन में आपका सहयोग कर रहा है ने अभिमंत्रित करके जनेऊ बनाया है — क्या यह पवित्र है ?
नंदिनी ने कहना जारी रखा —’ यदि यह सब पवित्र है , तो इनको बनाने वाले अपवित्र कैसे हुए ?
- यदि ईश्वर महान है, पवित्र है, तो उसके बनाये हुए इन्सान ; जिन्हें आप जैसे इंसानों ने ही ” दलित ” का नाम दिया है —– अपवित्र कैसे हुए ?
- इन दलित इंसानों द्वारा निर्मित वस्तुओं को यदि भगवान पवित्रता के साथ स्वीकार करता है , धर्मग्रन्थ स्वीकार करते हैं तो – एक इन्सान इसको कैसे नकार सकता है , और यदि पूजन सामग्री बनाने वाले चाहें वह दलित ही क्यों न हों , उनकी बनाई यह सामग्री यदि पवित्र है तो ………उनके द्वारा जन्मी उनकी संताने अपवित्र कैसे हुई ?
- पांडित्य कर्म करने वाले मेरे बेटे से उसकी जाति नही पूंछी गयी , जबकि उसकी माँ दलित है , और मेरा जन्म दलित के घर हो जाने मात्र से मैं दलित , अछूत कहकर अस्वीकार कर दी गयी…. क्यों………? जबाब दीजिये पंडित जी ….. क्यों ?” नंदिनी के स्वर में वेदना थी | धर्मा समझ गया था कि नंदिनी जिस बालक का जिक्र कर रही है वह उसका अपना पुत्र है …., कुछ पितृत्व की पुकार और कुछ नंदिनी की बातों का असर धर्मा पर ऐसा हुआ कि वह उठ खड़ा हुआ और अपने पुत्र का हाँथ पकडकर नंदिनी के पास बराबर में जा खड़ा हुआ | फिर पिता कि तरफ मुखातिब होकर बोला –” पिताजी – आप हमें अपनाएं , चाहे न अपनाएं , मेरे अन्दर अब आपकी वह आज्ञा पालन करने कि शक्ति नही है जो आपने मुझे दस वर्ष पहले दी थी | मैं अपने बेटे और नंदिनी के साथ जा रहा हूँ |”
“……… रुक जाओ बेटा ! नंदिनी, आज तुमने इस बूढ़े की आँखें खोल दी | अब और शर्मिंदा न करो , आओ मेरे बच्चों ….. पूजा की वेदी पर बैठो….वैसे भी पूजा की वेदी पत्नी के बिना अधूरी रहती है | तुम दोनों के विवाह का समाज भले ही साक्षी न रहा हो , परन्तु तुमने ईश्वर को साक्षी मानकर मन से एक-दूसरे को पति-पत्नी के रूप में स्वीकार किया है | इसलिए आओ , पूजन को संपन्न करो |”
पूरा गाँव पंडित रमाशंकर की जय-जयकार कर रहा था, और नंदिनी ……., नंदिनी अपने पुत्र के साथ मिसाल बन गयी थी ……… “अभ्युदय” की | लोगों की समझ में आ गया था कि व्यक्ति अपने अभ्युदय या पतन के लिए स्वयं जिम्मेदार होता है |

कोई नहीं आएगा आगे, आपका पैर बढ़ाने,

खुद कदम बढाओ, लोग पीछे जुड़ते चले आयेंगे |

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