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शादीशुदा बनाम बेचारा

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**** मैंने सुबह प्रतिदिन की तरह अखवार पर नजर डाली , देखा कि समाचार-पत्र ने ” कथा चयन प्रतियोगिता ” का आयोजन किया है | क्यों न मैं भी कुछ लिखूं, यही सोच जैसे-तैसे अपने बौद्धिक स्तर के अनुरूप एक खानी तो लिख डाली , परन्तु आयोजकों की एक शर्त थी कि ‘ हस्त लिखित रचना स्वीकार नही की जाएगी अतः लेखक कृपया टाइप अथवा कम्प्यूटर प्रिंट की हुयी कहानी ही भेजें | ‘ परन्तु इस कस्बे में प्रिंट तो दूर की बात , कोई टाईपिस्ट तक नही उपलब्ध है |सीधी सी बात , कम्प्यूटर प्रिंट निकलवाने शहर जाना पड़ेगा |
‘ परसों इंटरव्यू देने शहर जाना है , कहानी भी लिए जायेंगे , वहीं प्रिंट हो जाएगी |’ मुझे ध्यान आया |
********** टाईपिस्ट की तलाश में मैं प्रत्येक दुकान पर नजर डालता पैदल ही चला जा रहा था | बायीं ओर साइन बोर्ड पर नजर पड़ी, टाईपिस्ट की ही दुकान थी वह | मैं अन्दर पहुंचा | कंप्यूटर चेअर पर बैठा वह व्यक्ति मेरी तरफ घुमा -
‘ क्या बात है ?’
‘ इस कहानी को टाइप करवाना है |’ मैंने पाण्डुलिपि उसकी तरफ बढ़ा दी | उसने कहानी के पन्नो को उलट-पलट कर देखा -
‘ दो सौ अस्सी रूपये पड़ेंगे |’
दो सौ अस्सी ………, रहने दीजिये , बहुत ज्यादा बता रहे हो |’
‘ दो सौ रूपये देंगे ?’
‘ नहीं , भाई साहब |’ मैंने पाण्डुलिपि लीऔर बाहर आ गया | सोंचा ‘शी’ कितने दिनों से कह रही है की ‘री’ [ बच्ची ] के लिए एक गर्म सूट ला दो | बीस रूपये में टाइपराइटर से कहानी टाइप हो जाएगी और बाकी पैसों में कुछ और मिलाकर ‘री’ के लिए सूट खरीद लूँगा |
मैं तेज क़दमों से चला जा रहा था,घर से निकलते समय ‘शी’ ने हिदायत दी थी –’ शाम को पांच बजे तक हर हाल में घर वापस आ जाना |’ कुछ आगे चलने पर एक अन्य ‘ कंप्यूटर जॉब सेंटर’ पर नजर पड़ी, सोंचा यहाँ भी देख लूँ | अन्दर पहुंचा तो कंप्यूटर स्क्रीन से नजर हटाकर, मेरी ओर देखकर उस आपरेटर ने पूंछा –
‘ कहिये मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ ?’
‘ इस कहानी का प्रिंट निकलवाना है |’
उस लड़के [आपरेटर ] ने हस्तलिखित कहानी को देखा – ‘ दस पेज तो हो ही जायेंगे, एक सौ बीस रूपये पड़ेंगे |’
न जाने क्या सोंचकर मैंने कह दिया -’ एक सौ रूपये लेंगे ?’
वह कुछ सोंचकर बोला – ‘ ठीक है, एक बजे आकर ले लेना |’
‘ कुछ एडवांस ………?’
‘ सुबह का टाइम है, बोहनी नहीं हुयी है, कुछ दे देते तो अच्छा रहता |’
मैंने पचास रूपये उसे दे दिए और अपने साक्षात्कार – स्थल की ओर चल दिया |
************** मैं सोंच रहा था की कुँआरा व्यक्ति बड़े सुकून में रहता है- जब चाहो, जहाँ चाहो आराम से घुमो-फिरो ‘ परन्तु एक शादीशुदा व्यक्ति के लिए झंझट ही झंझट है | सुबह मेंडिटेशन में बैठो तो ‘री’ सिर पर खड़ी होकर चिल्लाएगी – ‘ पापा, मम्मी ने डाटा है |’ ‘शी’ का तेज स्वर कानों में पड़ेगा –’चीनी ख़त्म हो गयी है, अभी लानी है, लाओगे तभी चाय बन पायेगी |’
बस हो गया ‘मेंडिटेशन’ झल्लाकर उठा जनरल स्टोर पर पहुंचा, दुकानदार पूंछता है –
‘ भाई साहब क्या पूजा अधूरी छोड़कर चले आये ? [ वह मेरी दिनचर्या से परिचित है ] झल्लाहट होती है उसके प्रश्न पर , बस इतना ही कह पाता–’ मैं शादीशुदा हूँ , समझे !’
************* दो बज रहा है, इंटरव्यू समाप्त होते ही मैं कंप्यूटर जॉब सेंटर पर पहुंचा | आपरेटर से प्रिंट माँगा , जबाब मिला-’ बस एक घंटा और इंतजार कर लीजिये |’
मैंने आश्चर्य व्यक्त किया – ‘ एक बजे का समय दिया था, और दो बज रहा है अभी तक आपने टाइप नही कर पाया |’
‘ भाई साहब ! आपने लिखा ही इतना छोटा-छोटा था कि समय ज्यादा लग रहा है |’ उल्टा चोर कोतवाल को डांटे- मुहाबरा याद आ गया | मरता क्या न करता, आधा पैसा एडवांस जो दे चूका था |
‘ ठीक है, मैं एक घंटा और इंतजार कर लेता हूँ, तीन बजे तक काम हो जाना चाहिए क्योंकि मुझे यहाँ से लगभग एक सौ किलोमीटर दूर जाना है |’
‘ दरअसल यहाँ काम ज्यादा हो गया था, इसलिए कहानी को मैं दुसरे सेंटर पर दे आया | पर आप चिंता न करें, वह भी अपना ही सेंटर है | एक घंटे में काम हो जायेगा, तब तक आप अन्दर आ जाईये , इस एल्बम को देखिये |’ उसने एक कंप्यूटर की तरफ इशारा करते हुए कहा |
********** दुसरे कंप्यूटर पर किसी एल्बम की सी.डी. चल रही थी – मैं अन्दर आ गया – ‘ साला मक्खनबाजी करता है |’ मैं बुदबुदाया और दुकान का निरीक्षण करने लगा | यह सेंटर एक हालनुमा दुकान में स्थित था जिसमें प्लाईवुड से पार्टीशन कर अलग-अलग चैंबर बना दिए गये थे |
*********** तीन बज गये , मैं अपनी जगह से उठा और उस चैंबर में घुस गया जहाँ वह लड़का [ आपरेटर ] कंप्यूटर पर कुछ कार्य कर रहा था | घडी की ओर देखते हुए मैंने कहा – ‘ एक घंटा हो चूका है |’
वह चुपचाप उठा, साइकिल उठाई और संभवतः उसी सेंटर पर चला गया जहाँ कहानी टाइप हो रही थी |
************* दुसरे चैंबर का दरवाजा खुला, एक लडकी बहार आई , मैंने पूंछा –
‘ कहाँ पर है आपका दूसरा कंप्यूटर सेंटर ?’
‘ मेरा कोई भी दूसरा सेंटर नही है |’ उसने बेबाकी से उत्तर दिया, मै हैरान-परेशान |
सवा तीन बज रहा है, मैं सोच रहा था – इस कहानी के चक्कर में इतना लेट हो गया | रास्ते में भी चार घंटे से कम समय नही लगेगा | मुझे ‘शी’ की पांच बजे तक लौट आने की चेतावनी याद आ गयी | सोंचा फोन करके बता दें कि – ‘ कुछ लेट हो जाऊँगा | ‘
********** हैलो ! हाँ पापा मैं अमि…. शहर से अभी एक घंटे बाद चलूँगा, संभवतः आठ बजे वाली ट्रेन से वहां पहुंचूगा |’
शुक्र है पापा ने फोन उठाया , वर्ना अभी ‘शी’ का लम्बा-चौड़ा व्याख्यान सुनना पड़ता |
************ मैं पुनः उसी सेंटर पर आ गया | वह लड़का अभी वापस नहीं आया था |
चैंबर से वाही लडकी बाहर निकली, ब्लैंक विजिटिंग कार्ड से एक कार्ड निकाल कर मेरी ओर देखा और उसे चूम लिया फिर मेरे बाएं तरफ से इस तरह मुस्कराते हुए निकली जैसे हवा में चल रही हो |
‘ सत्यानाश हो तेरा, बेशरम कहीं की, मुझ पर लाईन …………| ‘शी’ को पता चल गया तो मेरे साथ तेरी भी ऐसी की तैसी कर देगी |’
‘ आपने कुछ कहा ?’ उसने पूंछा |
‘ जी, कुछ नहीं |’ मै हडबडा गया |
**************** टाइप किये हुए चार पेज लेकर विजयी मुद्रा में वह लड़का आ गया -
‘ इसमें करेक्शन कर लीजिये, पूरी कहानी टाइप हो चुकी है बस प्रूफ रीडिंग बाकी है | पांच मिनट में काम हो जायेगा |’
मैं करेक्शन करने लगा — कहानी में एक नाम जो ‘ जानकीदास गुप्ता ‘ था उसे
‘ जानकारीदास गुप्ता ‘ और एक विशेषण ‘ स्वर सम्राज्ञी ‘ को ‘ स्वर सामग्री ‘ टाइप कर दिया था | इसे ठीक करके लडके को थमा दिया | करेक्शन किये प्रूफ को लेकर वह निकल रहा था कि एक अन्य सज्जन का आगमन हुआ –
‘ शादी के कार्ड तैयार हो गये ?’ सज्जन ने पूंछा |
‘ अभी नहीं सर !’ बेचारगी से उस लडके ने जबाब दिया |
‘ क्यों ?’
‘ दरअसल आपने कार्ड पर जो लोगो दिया था, उसे सेट करने में बड़ी दिक्कत हुयी -इसीलिए लेट हो गया |”
‘ शादी को चार दिन बचे हैं , कार्ड क्या शादी के बाद वितरित करेंगे ?’ वह झल्ला उठा |
*********** एक अन्य चैंबर से एक तेज-तर्रार ,हिप्पीकट बालों वाली महिला [ शायद सेंटर कि प्रोप्राइटर ] निकली और उस लड़के को झिड़कने लगी – ‘ इस तरह से काम करोगे तो सारी दुकानदारी ही चौपट हो जाएगी |’ मेरी तरफ देखकर पुनः उन सज्जन से मुखातिब हुयी -’ यह भाई साहब दो घंटे से बैठे हैं , अभी काम करके नही दे पाया |’
लड़के ने मेरी कहानी के करेक्शन किये हुए चार पेज उठाये और चलते बना |
********** एक घंटा और बीत गया, दिल में घबराहट सी होने लगी | मुझे उसकी कार्यशैली पर गुस्सा आने लगा सोंचा एक साथ इतना काम ही क्यों ले लेता है जो समय से पूरा करके नही दे पाता | इसमें अपना ही तो नुकसान कर रहा है यह |
अब तो ट्रेन भी नही मिलेगी, कुंआरा होता तो लेट – लतीफ़ भी घर पहुंचता तो कोई बात नही थी, लेकिन मैं तो शादीशुदा हूँ | जब तक घर नही पहुंचता ‘शी’ इंतजार करेगी, शायद खाना भी नही खाएगी |
इस ‘शी’ ने तो परेशान कर रखा है, हर काम की टाइमिंग ; इंजन के पुर्जे की तरह |
मैं सोंच रहा था कि ‘ क्या शादीशुदा आदमी इंजन है , जो दुसरे कि इच्छा के अनुसार चलता-बंद होता है | ‘
**************** पांच बज गया, अब मुझे वहां बैठे-बैठे बेचैनी होने लगी थी | मै उठा और जिस दिशा में लड़का गया था , उसी दिशा में एक-एक दुकान देखते हुए चल पड़ा |
मिल गया वह- एक दुकान में में बैठा हाँथ हिलाकर मुझे बुला रहा था | मैंने दुकान में प्रवेश किया — दो कंप्यूटर और दोनों पर मेरी कहानी ही टाइप हो रही थी | अभी बहुत काम बाकी था, मैंने उस लडके को घूरा, वह सकपकाया और बिना कुछ कहे बाहर निकल गया |
मैंने सोंचा दो-तीन पेज रह गये हैं तो अब इन्हें टाइप करवा ही लें | मैं स्क्रीन पर ही पढ़कर उसमें करेक्शन करने लगा | टाइपिस्ट बोला – ‘ भाई साहब इतनी जल्दी क्या है? अभी प्रूफ निकाल देंगे , आराम से करेक्शन कर लीजियेगा |’
‘ अभी मुझे यहाँ से सौ किलोमीटर दूर जाना है , और सबसे बड़ी बात -मैं शादीशुदा हूँ |’ मैंने अपनी वस्तु स्थिति स्पष्ट कि |
************* लगभग सात बजे कहानी टाइप हो पाई | उसे लेकर मैंने रिक्शा किया और बस स्टेशन पहुंचा | बस मिल गयी — कुछ सुकून हुआ | अँधेरा हो गया था , गाड़ियों की हेडलाइटें जल चुकी थीं परन्तु चालक ने बस के अन्दर की लाइट बंद कर थी, फलतः बस के अन्दर अँधेरा छा गया | मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं , वैसे भी अँधेरे में आँखें खोले रहने से कोई फायदा नही |
बस रत के अँधेरे को चीरते हुए चली जा रही थी, एकाएक पिछले पहिये से कुछ आवाज आने लगी | चालक ने निरीक्षण के लिए बस रोकी, नीचे उतर कर देखा कि पिछले टायर से हवा निकल रही थी पता चला कि बस में स्टेपनी भी नही है | शुक्र था कि बस एक कस्बे के नजदीक पहुंच चुकी थी, जहाँ से कुछ ही दुरी पर पंक्चर की दुकान थी | दुकानदार बुलवाया गया, उसने देखा , फिर बताया पंक्चर हो गया है , पहिया खोलना पड़ेगा |’
मेरे होश फाख्ता, पहले ही पांच घंटा लेट हो चुका हूँ, अभी एक बस और बदलनी पड़ेगी तब कहीं घर पहुंचूगा | अब यह भी एक आफत – कम से कम एक घंटा तो और गया |
कुछ यात्री नीचे उतरे, एक बोला-’ अभी दूसरी बस आ रही होगी उस में बैठ लेंगे |’
‘ इतनी रात गये ” नान स्टापेज जगह पर भला कोई बस क्यों रोकेगा ?’
‘ रोकेगा कैसे नही , हम लोग गाड़ी के आगे खड़े हो जायेंगे |’
मैंने सोंचा -लगता है यह लोग अभी अविवाहित हैं अथवा इन्होने अपना बीमा करवा रखा है |
मनु ने कितनी बार मुझसे कहा -’ बीमा करवा लो |’ परन्तु मेरे पास इतने पैसे ही नही हो पाते की बीमा करवाता |
‘ अरे, नही….नहीं, मै शादीशुदा हूँ, मैंने बीमा भी नही करवा रखा है, मैं बस रुकवाने के लिए आगे नही खड़ा हो सकता | कहीं बस मेरे ऊपर चढ़ गयी तब ‘री’ और ‘शी’ का क्या होगा ……..नेवर…. मैं ऐसा नही कर सकता |’
मैंने महसूस किया कि शादीशुदा व्यक्ति कितना कायर हो जाता है |
रोड पर दूर से हेडलाइट चमकी, एक युवक बीच सड़क पर खड़ा हो गया | पास आने पर पता चला वह एक ट्रक था | साथी ने उसके एक धौल जमाई कमबख्त ट्रक और बस में अंतर नही समझता |’ अगले प्रयास में बस रुकी– मैं शादीशुदा हूँ , जल्दी घर पहुंचना है अतः जल्दी से बस चढ़ गया | पहले से भरी बस में सबसे पीछे की सीट नसीब हुयी | उबड़-खाबड़ रास्ते पर चल रही कबाड़ हो चुकी परिवहन निगम की उस बस की पिछली सीट पर फुटवाल की तरह उछलता हुआ , मुफ्त का धुल रूपी पाउडर लगाते हुए एक बार पुनः सफर शुरू हुआ |
कुछ सवारियां इस पर भी संतुष्ट हैं, संतोष तो मुझे भी है परन्तु मुझे डर है तो इस बात का कि कपड़ों की धुलाई के समय साथ में मेरी भी खबर ली जाएगी |
********* आखिर वह बस स्टैंड आ गया, जहाँ से मुझे दूसरी बस पकड़नी है | नीचे उतरा सोंचा फोन करके यह बता दें कि ट्रेन छुट गयी थी अतः हम बस से ही आ रहे हैं |
‘शी’ ने ही फोन रिसीव किया –’ अरे आप ट्रेन से क्यों नही आये? जानते हो पापा रेलवे स्टेशन तक जाकर ढूंढ़ आये |’
मुझे लगा पापा अब भी मुझे दूध पीता बच्चा समझते हैं | खैर, ‘शी’ से मैंने पूंछा -’ खाना खा लिया ?’
‘ अभी नही आप आ जाओ तब खा लुंगी |’
‘लेकिन नौ बज रहा है, तुम खाना खा लो , मैं दस-ग्यारह बजे के बीच वहां पहुंच पाऊंगा |’
‘ नही आप जी भर के टहल लो, मै खाना नही खाऊँगी |’
मैंने गुस्से में रिसीवर क्रेडिल पर पटक दिया | p .c .o . वाले ने पूंछा –
‘ क्या बात है भाई साहब ?’
‘ तुम शादीशुदा तो नही हो ?’ मैंने उल्टा उस से प्रश्न किया |
‘ नहीं |’ वह मासूमियत से बोला |
‘ लेकिन मैं शादीशुदा हूँ |’ मैंने उस से चिल्लाकर कहा |
सामने दिल्ली डिपो कि बस खडी थी, ‘ क्यों भाई साहब, क्या जे.बी.गंज में इसका स्टापेज है?’
‘नही’ लेकिन हम आपको वहां उतार देंगे, किराया भी वहीँ तक का लेंगे | आईये बैठ जाईये ……, पैसे दे दीजिये लेकिन टिकट नही काटूँगा मैं….|’ परिचालक ने बेशर्मी से कहा |
मैंने मन ही मन सोंचा – ‘ टिकट न काटकर सरकार का पैसा खुद हजम कर रहा है यह |’ परन्तु क्या करता ; मैं बस में बैठ गया |
********** बस चल पड़ी मैंने घडी देखी सवा नौ बज रहा है, न जाने क्यों बार-बार मेरी नजर घडी पर जा रही है | दस बज गया — चलो पहुंच ही गये अभी एक किलोमीटर होगा यहाँ से दो-तीन मिनट में घर पहुंच जाऊंगा | परन्तु यह क्या पास के ढाबे पर बस रुकी…..| चालक/परिचालक समेत अधिकांश यात्री ढाबे में घुस गये | अब तो खाना-पीना करके ही चलेंगे यह लोग …..मतलब कम से कम एक घंटे का रेस्ट…|
रात के दस बजे , सर्द मौसम में , घर से मात्र एक किलोमीटर दूर एक घंटे तक बस कि प्रतीक्षा करना एक शादीशुदा व्यक्ति के लिए बेबकूफी है |
मैं घर के लिए वहां से पैदल ही चल दिया | सोंच रहा था , पंद्रह मिनट में घर पहुँच जाऊंगा फिर अभी ..’शी’ का भाषण सुनना है, खाना; खाना है, सोना है और सुवह पांच बजे उठ जाना है , रोजी-रोटी के जुगाड़ में ; क्योंकि मैं एक शादीशुदा बाल-बच्चेदार व्यक्ति हूँ………|

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35 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Geri के द्वारा
July 11, 2016

Non c’est morose parce que les gens élus confondent leurs missions et la soif de pouvoir. Ennahda n’a pas été élu pour diriger le pays mais pour former avec les autres partis la constituante et écrire la Constitution ! On attend toujours… Et faut il vous parler des salafistes qui n’en font qu’à leur tête ? Des tentatives de censure des médias, des pressions sur les juges ? Des chiffres de l&©uoso;Ãrcqnomie bidonnés ? Etc etc.Ennahda et la démocratie, ça fait deux !

atharvavedamanoj के द्वारा
October 3, 2011

आदरणीय कैलाश द्विवेदी जी| आप लाफिंग थेरेपी के डॉक्टर हैं क्या? वैसे तो मैं भी शादीशुदा हूँ लेकिन जीवन में इतना खुलकर कभी नहीं हंसा|कुछ तो रहम करो भाई किस किस को बताते फिरोगे की मैं शादी शुदा हूँ? मजा आ गया|

    Dr.KAILASH DWIVEDI के द्वारा
    October 3, 2011

    आदरणीय मनोज जी , सादर अभिवादन ! सर्वप्रथम आपका मेरे ब्लॉग पर स्वागत है, वैसे तो मैं प्राकृतिक चिकित्सक हूँ परन्तु लाफिंग थेरेपी भी ड्रगलेस थेरापी है इसलिए इसे भी प्राकृतिक चिकित्सा में शामिल कर लेते हैं | परन्तु इस रचना के विषय में एक राज की बात आपको बताऊँ — यह मेरी आपबीती घटना है, जो मेरे साथ लगभग १० वर्ष पहले घटित हुयी थी | आप शादीशुदा होने के बाबजूद खुलकर हंस लिए, मेरा परिश्रम सार्थक हो गया | प्राकृतिक चिकित्सा में यदि आपकी रूचि है तो मेरे दूसरे ब्लॉग – http://naturecure.jagranjunction.com विजिट कर सकते हैं | समय देने के लिए आपका बहुत-बहुत आभार !

rajkamal के द्वारा
October 3, 2011

पीटीआई ha ha ha हा हा हा हा क्या बात पूछी है सर जी ! इसका मतलब तो नहीं पता है लेकिन मैं लिखना पति ही चाहता था ….. गूगल हिंदी इनपुट में कई शब्दों की आप्शन में से किसी एक को चुनना पड़ता है …. बस सही शब्द चुनने में मिस्टेक हुई गवा लेकिन हम जानते है की आपके सास ससुर से कोई मिस्टेक नहीं हुआ यू आर दा राईट च्वायस बधाई और शुभकामनाये

    Dr.KAILASH DWIVEDI के द्वारा
    October 3, 2011

    क्या बात है भाई जी………….आनंद आ गया !!!!!

    Xexilia के द्वारा
    July 12, 2016

    Great fer7;ae!I&#821tum not sure how moisturizing the Garnier product is, however, given that the 3rd listed ingredient is alcohol which is super drying and causes free-radical damage and collagen breakdown. Also, this is a highly fragranced product.

Alka Gupta के द्वारा
October 3, 2011

डाक्टर साहब , बहुत ही सुन्दर हास्य विनोदी रचना !

    Dr.KAILASH DWIVEDI के द्वारा
    October 3, 2011

    आदरणीय दीदी जी , सादर प्रणाम ! उत्साहवर्धन के लिए आभार |

    Lexus के द्वारा
    July 12, 2016

    Moi j’ai loupe 2 aiolis recemment, en essayant de les monter avec l’ail, les jaunes d’oeuf et l&;ouqsrhuile -dans cet ordre. Ma Belle Mere dit qu’il faut mettre l’ail apres, contrairement aux livres de recettes. Par contre, vive le batteur pour les rattrapper!

Vinita Shukla के द्वारा
October 3, 2011

बहुत ही सुन्दर शब्दों में बयां की है आपने उस इंसान की व्यथा कथा, जो शादीशुदा है, बाल- बच्चेदार है और जिंदगी की जेद्दोजेहेद में उलझा रहता है.

    Dr.KAILASH DWIVEDI के द्वारा
    October 3, 2011

    आदरणीय विनीता जी, सादर अभिवादन ! आपने समय दिया आपका आभार !

    Chris के द्वारा
    July 12, 2016

    That’s a brilliant answer to an inienesttrg question

Santosh Kumar के द्वारा
October 3, 2011

आदरणीय डॉ . साहब ,.सादर अभिवादन बढ़िया रचना ,…लम्बाई थोडा कम रखने का प्रयास करें ,..रोचकता और बढ़ेगी ,.. शादीशुदा जीवन में जिम्मेदारी का एहसास तो सभी विवाहितों को होता है ,..बाकि हमारा सिस्टम और अपनी छोटी होती जेब मुसीबत और बढ़ा देती है ,…मैं भी विवाहित हूँ भाई ,..और सच कहूं तो मुझे फायदे ही फायदे नजर आते हैं ,…तंगी तो हर जगह होती है ,.. बढ़िया रचना ,..बधाई

    Dr.KAILASH DWIVEDI के द्वारा
    October 3, 2011

    आदरणीय भाईसाहब, सादर प्रणाम ! उत्साहवर्धन के लिए आभार | आपकी सलाह का आगे से ध्यान रखेंगे |

    Tuesday के द्वारा
    July 12, 2016

    Carlos Lopes / Redundância falar a respeito de sua inteligência e dignidade. É muito gratificante comentar junto a outras pessoas que foi meu sogro que idealizou esta baPnbira.naraeéds.

akraktale के द्वारा
October 3, 2011

आदरणीय डॉ. साहब नमस्कार, बहुत सुन्दर बेचारगी. मंच की किसी महिला सदस्य ने आपकी बात पर आपत्ति भी नहीं की, जो उन कुवारों के लिए सबक है जो सोचते होंगे ऐसा भी कहीं होता है, तो वे समझ लें ऐसा ही होता है. दूसरा ये की डॉ. साहब कृपया फॉण्ट के इस रंग का आगे उपयोंग ना करें हल्का रंग होने से मेरे चश्मे का नंबर बढ़ने का खतरा रहता है और फिर साहब ध्यान रखें मै भी एक शादीशुदा हूँ. सुन्दर रचना पर बधाई.

    Dr.KAILASH DWIVEDI के द्वारा
    October 3, 2011

    आदरणीय भाईसाहब, सादर नमस्कार! उत्साहवर्धन के लिए आपका आभार | फॉण्ट के रंग के सम्बन्ध में आगे से ध्यान रखूँगा |

    Evaline के द्वारा
    July 12, 2016

    வாய்விட்டுச் à®°Ÿ#3007;சிக்கவேண்à®&ுà®®் போல் இருந்தது. ஏதாவது பதிவு உள்ளதா? எனத் தேடியபோது, இது பட்டது.படித்தேன் சிà®°ித்தேன். ஆனாலுà®®் வி.காவுக்கு இவ்வளவு குசுà®®்பு அதிகம்.

Abdul Rashid के द्वारा
October 2, 2011

आदरणीय डॉ. कैलाश जी सादर प्रणाम बेहतरीन हास्य बधाई हो

    Dr.KAILASH DWIVEDI के द्वारा
    October 2, 2011

    आदरणीय राशिद जी सादर प्रणाम ! उत्साहवर्धन के लिए आभार |

    Joan के द्वारा
    July 12, 2016

    Fittsprut må vara skönt men varför inte porra till det lite? Munsprut, komma över ryggen om man kört doytgsgyle. över brösten eller varför inte över magen på den man har sex med? De som tjatar får ju sällan en andra omgång :/

abodhbaalak के द्वारा
October 2, 2011

:) पहले भी आप इस रचना को पोस्ट कर चुके हैं महानुभाव, आप देखे, तब भी मैं कमेन्ट किया था……… इस बार भी कह रहा हूँ की बड़ी सुन्दर रचना ……. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    Dr.KAILASH DWIVEDI के द्वारा
    October 2, 2011

    आदरणीय भाई साहब सादर प्रणाम ! उत्साहवर्धन के लिए आभार | और आपकी याददास्त का राज मुझे चाहिए क्योंकि मेरे पास ऐसे मरीजों की संख्या अधिक रहती है जिनकी मेमोरी कमजोर हो गयी है |

    Kristabelle के द्वारा
    July 12, 2016

    Hmm. That parallel at the end of sai-asexemarrm-ge and legalized prostitution is really clever. I’m trying to think of how that same parallel might be used in the gun rights context.

sumandubey के द्वारा
October 2, 2011

कैलाश जी नमस्कार्। हास्य शैली में शादी -शुदा पति की बेचारगी का अच्छी तरह आपने वर्णन किया।

    Dr.KAILASH DWIVEDI के द्वारा
    October 2, 2011

    आदरणीय सुमन जी सादर अभिवादन ! उत्साहवर्धन के लिए आभार

    Sanne के द्वारा
    July 12, 2016

    LoeGlcltiarazie per i suggerimenti@ AnonimoIl bello è che ho passato giorni a cercare una versione per ebook, senza trovare niente, e poi eravamo in 2 a fare la stessa cosa! :-)

manoranjanthakur के द्वारा
October 2, 2011

बहुत बढ़िया

    Dr.KAILASH DWIVEDI के द्वारा
    October 2, 2011

    आदरणीय भाई साहब सादर प्रणाम ! उत्साहवर्धन के लिए आपका आभार |

Rajkamal Sharma के द्वारा
October 2, 2011

आदरणीय डाक्टर साहिब ……सादर अभिवादन ! एक अच्छा और जिंदादिल पीटीआई वहीकहलाता है जोकि आधी रात को घर आने पर अपनी पत्नी को दरवाजे पर झाड़ू सहित आवभगत के लिए खड़ी हुई देख कर कहे कि :- डार्लिंग इतनी रात को सफाई नही किया करते ….. बहुत बढ़िया हास्य रचना जिसमे कि हालात के शिकार पति पर तरस खाते हुए सहानभूति ही कि जा सकती है …. मुबारकबाद

    Dr.KAILASH DWIVEDI के द्वारा
    October 2, 2011

    आदरणीय भाई साहब सादर प्रणाम ! उत्साहवर्धन के लिए आभार | पीटीआई का फुल फार्म बताने की कृपा करें |

    Christy के द्वारा
    July 12, 2016

    TIP MEMBUAT TAS/SANDAL DARI KORAN BEKAS INAYIRSSINPA DARI MANA, CARA MENGOLAHNYA BAGAIMANA SUPAYA MENJADI SEBUAH KARYA DAN BISA MENGHASILKAN UANG

syeds के द्वारा
October 2, 2011

अच्छी हास्य रचना कैलाश जी… http://syeds.jagranjunction.com

    Dr.KAILASH DWIVEDI के द्वारा
    October 2, 2011

    आदरणीय सैयद जी सादर नमस्कार उत्साहवर्धन एवं पहली प्रतिक्रिया हेतु आपका आभार |

    Jeannie के द्वारा
    July 12, 2016

    Now I’m like, well duh! Truly thanufkl for your help.


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